Sunday, July 4, 2010

Wednesday, February 24, 2010

मुझे मेरी अंगूठी लौटा दो .

देश के बदलते हुए सरोकारों  में अंगूठी कि बात एक बेकार बात है .
लेकिन जब अंगूठी किसी आस्था और विश्वाश  के साथ जुडा हो , और किसी पुरानी याद कि तरह जिस्म में पबस्त हो जाये तब अंगूठी कि बात एक जरूरी बात हो जाती है .
बजट के दौरान अंगूठी कि बात --- हमे हो सकता है थोडा भटकाए लेकिन यह भटकाव मेरे इर्द - गिर्द के लिए जरूरी है .
आज दोस्तों से बात होते होते ----- किसी पत्रिका  के आगामी अंकों के विशेषांक को लेकर होने वाली तयारी को लेकर होने लगी कि ---- अगला अंक पत्रिका का बेवफाई पर निकल रहा है  .
सोचना चाहिए हमे कि उर्दू ग़ज़लों कि बेवफाई जब हिंदी कहानियों  में आयेगी तो क्या होगा.
कितने लोग अपनी अंगूठी मागने के लिए कई -  कई किलोमीटर कि यात्रा करेगें .

Thursday, February 4, 2010

रामबिरछा कि याद -- जैसे पीपल कि याद .

न्यायालय का एक दिन , मेरे लिए इतनी परेशानी का रहा कि अपने गावों के अनाम लोगों कि याद करा गया , जो सतु , चबेना बंधकर दिन - दिन भर  न्यायालय कि चक्कर लगाते अपनी जिन्दगी कि शाम कर देते हैं .
अपने गावं के अनाम लोगों के नाम एक चिट्ठी -------- कोई  एक नाम के साथ

     प्रिय रामबिरछा ,
उम्मीद है तुम्हारी  बेटी   जिसका नाम मैं भूल गया हूँ ( भूल कि माफ़ी  मागंता हूँ )  अच्छी होगी . याद है तुम्हे , जब तुम कई बरसों बाद मुझे गावं के किराने कि दुकान में मिले थे , मैं तुम्हे  पहचान  नहीं पाया था , और तुम लगातार मुझे देखते जा रहे थे . और जब तुमने बताया कि --- भूल गए बाबु मैंने आपको अपने कंधे पर घुमाया है . मैं घबरा गया था ये सुनकर , ग्लानी हुई , और लगभग  हकलाते हुए मैंने तुमसे पूछा  था ---- कैसे हैं रामबिरछ जी ? और फिर तुमने ढेरों बात बताई थी गावं के बारे में , सब मैं सुनता जा रहा था ----- और सोचता जा रहा था --- बेकार में मैं शहर में रहता हूँ ( क्यूँ ना गावं में दुबारा आया जाये ). मुझे याद आ रहा था कि जब मैं अपने पिता जी  के साथ शहर आने के लिए अपने परिवार के साथ गावं से निकला था , तुम साथ - साथ स्टेशन तक आये थे , तुमने शराब पी रखी थी  , माथे पर सामान रखे तुम लड़खड़ा रहे थे . पीता जी से नशे कि हालत में कई बात किये जा रहे थे , जो तुम होश में कभी नहीं कर सकते थे . वो सब बात मैं आज तुम्हे  याद दिलाना चाहता हूँ  , लेकिन वो सब मिलकर बताना चाहता हूँ ( नहीं जानता कि तुम आज जीवित हो या नहीं ) . तुमने उस दिन स्टेशन पर बताया था कि कैसे  तुम आजकल एक केश में हर महीने कोर्ट जाते हो , कितना खर्चा  हो जाता है , कैसे  वो झूठा केश तुम्हे चैन से रहने नहीं देता , तुम कैसे भूखे पेट दिन - दिन भर  कोर्ट में चक्कर लगाते रहते हो , और निराश होकर शाम होते घर  पहुचते हो , किसी से कुछ कहने का मन नहीं करता है .
आज कई बरस के बाद रामबिरछा मेरा भी वही हाल है , तुमरे पास पैसे नहीं थे , झूठा केश था , सच कहूँ अगर तुम्हारे  पास पैसे भी होते ना उस दिन तब भी तुम भूखे ही रहते , क्यूंकि कोई भी इमानदार आदमी कोर्ट में खाना खा ही नहीं सकता  , जैसे कि मैं नहीं खा सका , पैसे होते हुए भी .

रामबिरछा मैं इस चिट्ठी को , बहुत भारी नहीं करना चाहता , बस इतना कि आज तुम्हारी बहुत  याद आ रही है , और याद इसलिए नहीं कि मैं बहुत तकलीफ महसुश  कर रहा हूँ , बल्कि यह कि उस दिन मैं तुम्हारी  तकलीफ क्यूँ नहीं जान सका . क्यूँ नहीं ?

                                                                                                                           तुम्हारा
                                                                                                                           --------------

Tuesday, February 2, 2010

--- और तब भी खाता और पीता हूँ

यह समय वह समय ----- "एक  जूता पैर में और एक हाथ" में का है . अपने विश्वाशघाती समय में , जब की अपने आचरणों में घोर अलोकतांत्रिक होते हुए , अपने लेखन में, अपने भाषण में लगातार लोकतान्त्रिक बने रहने के ढोंग के साथ जीता मनुष्य मेरे साथ / मेरे पास पसरा हुआ है . उसका यह पसरना किसी आक्टोपस की तरह का है जो अपने पंजे में सबकुछ को समेटते हुए रक्त-मांस   को  चूस कर छोड़  देता है ; असल में यह एक वर्गीय चरित्र की तरह हमारे समय में विकसित हो चुका है .
एक दूसरा वर्ग जो रीढ़ - विहीन है --- जिससे  न ठीक से समर्थन में कुछ बोलना आता है और ना ही विरोध में . जिसके मुहं खोलने मात्र से घिन आने लगती है .
एक और वर्ग है --- जिसे रात - रात भर  नींद नहीं आती है. उसके दिमाग में ऐसा क्या  है जो उसे सोने नहीं देता -- ? उसके दिमाग में कुछ चीजे लगातार  रात भर  चक्कर लगाती है.  जरूरी नहीं की वह मुक्तिबोध की तरह का आदमी हो , या उनकी तरह के  वर्ग का हो . 
आजकल वह आदमी मेरे दिमाग में लगातार चक्कर लगाता है ; और मैं यह कविता बार  - बार पढ़ता हूँ -----------

" सच है कि मैं अब भी रोटियों से वंचित नहीं हुआ हूँ
मगर , यकीन करो , यह केवल संजोग है .
मैं कुछ भी करूँ , मुझे कोई अधिकार नहीं पेट भरने का .
 
यह एक संजोग है कि मैं बचा रह गया हूँ .
( जिस दिन तक़दीर दगा देगी , मैं भी गुजर जाऊंगा .)
मुझसे कहा  जाता है , खावो और मौज करो, खुश रहो
कैसे  खुश रहूँ , पिउं, मौज करूँ , ऐसे  समय में .
यह रोटी का टुकड़ा जो मेरे हिस्से है ,
किसी भूखे का छिना  हुआ कौर था ,
यह पानी का गिलास जो थामे हुए हूँ मैं हाथ में
प्यास से मरते हुए आदमी से
छिना ही तो गया था

और तब भी खाता और पीता हूँ  .

                                                                    
( बर्तोल्त ब्रेख्त पर मेरे द्वारा लिखे जा रहे लेख का एक हिस्सा है )

Sunday, January 31, 2010

उम्मीद को नाउम्मीद में बदलने की साजिश

आवाज़ जब लगाई जाये तो , तो फिर सुनी  जाये . जिस बात के लिए आवाज़ लगाए जाये , उसी का संदर्भ लिया जाये . महात्मा गाँधी के सहादत दिवस के दुसरे दिन जब हम एक साथ बात  कर रहे थे --- तब कई लोगों ने बात को कई -  कई बार मुद्दों को बदलने की कोशिश की .  मुद्दा ये की कल एक अध्यापक को निकाले जाने के मसले को लेकर हम बात कर रहे थे , और लोग अपने कंप्यूटर की बात करने लगे की वो कैसे काम करता है .
दरअसल मामला उम्मीद को नाउम्मीद में बदल देने की साजिश  का है . जब भी कोई उम्मीद की जाती है या बनाई जाती है -- तमाम विरोधी हवाएं उसे नाउम्मीद की तरफ ले जाने की कवायद शुरु कर देती है . पिछले दिनों हमारे विश्वविद्यालय में कुछ इसी तरह की उम्मीदी और नाउम्मीदी  की बात शुरु हो गई थी .
सम्झुता  परस्त लोगों के खिलाफ हम एक मुहीम चलायें .

Thursday, January 28, 2010

इमानदार हैं तो सावधान रहिये

यदि आप इमानदार हैं तो सावधान रहिये , आपकी इमानदारी को शाजिशन बईमानी में बदला जा सकता है . आपके चारो तरफ के लोग आपके इरादों , मंतव्यों को तोड़ने  की हर संभव कोशिश में अपना योगदान देना चाहेगा .
और हाँ - अगर आप किसी सत्ता के विरोधी हैं , और विरोध का कोई इमानदार कारण है , तो ज्यादा  सावधान रहने की जरूरत है .  राष्ट्र- राज्य के भीतर रहकर विरोध करना आपने आप में एक बहादुरी है . लेकिन आपको यह देखना होगा की राष्ट्र - राज्य आपके इस  विरोध को किस तरह से लेता है. आपके इस विरोध में और कितने लोग साथ हैं , ये बहुत मायने रखता है ---- "एकला चलो" के नारे को याद करते हुए यह भी याद रखना होगा की  "अकेला चना भाडं नहीं फोड़ता " .
आजकल एक इमानदार आदमी रोज मेरे इर्द- गिर्द घूमता है , परेशां रहता है ---- असल में वो कुछ अच्छा करना चाहता है .
आपसे उसके समर्थन में आने की अपील करता हूँ .

Sunday, January 24, 2010

सही और सरल आदमी की परेशानी

विश्वविद्यालय  को क्या बहुरास्ट्रीय कंपनी होना चाहिए. शिक्षा संस्थान  में पसरते हुए गैर जवाबदेही बाले माहौल  में यह  बहस शुरु हो चुका है .
कृपापात्र  लोगों की काहिली और संष्ठानो से उपजे भरष्ट  आचरणों ने एक ऐसे समय का निर्माण किया है जहाँ सही और सरल लोगों के लिए कोई जगह नहीं बची है .
यह खबर गर्म है की ऐसे सही और सरल लोगों को काहिल लोगों द्वारा परेशां करने की दुरभिसंधि रची जा रही है.
बहुत जल्द ही उसके परिणाम देखने  को मिल सकते हैं.
समय पर काम को खतम करने बाले लोग मुर्ख होगें और परेशां होगें.वे  सता की  कुर्सी के इर्द - गिर्द , रहने वाले चापलूस के सामने निहायत ही बौने  और बेकार साबित होगें .
आएये चापलूसी , सत्ता की दलाली करने बाले के विरुद्ध एक जनमत तैयार  करें.